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स्त्री भी एक नदी सी है

 स्त्री भी एक नदी सी है....  उसे अपने बहाव में बहने दो, वह सब जानती है कि कितने बहाव में बहना है, कब थमना है, कहाँ मुड़ना है. अगर उसे बांधने की कोशिश की तो या तो वह अपनी दिशा बदल देगी या रौद्र रूप धारण कर लेगी क्योंकि उसे भी पता है कि वह कितनी भी विस्तृत हो जाये,मार्ग से अपने भटक जाये पर अंत में वह सागर से ही मिलेगी...  Pallavi Laghate
 https://www.momspresso.com/parenting/parenting-style/article/tumhaarii-thoddii-sii-bevfaaii-ojzstfx8peyb
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"मनोबल "

  एक चिड़िया बड़ी मेहनत से संजोती है नीड़ अपना बार बार उड़ती है और ले आती हैं चोंच में दबाकर छोटे छोटे तिनकों को...  फुर्ररर से उड़ जाती है और जब वापस आती है तो चोंच में होती है कभी झाड़ू की कतरन,तो कभी कपड़े और कागज की चिंदियाँ.  पहले कुछ क्षण वो ताकती हैं कि कोई खतरा तो नहीं और जब आश्वस्त हो जाती है कोई आहट ना पाकर, तो चुपके से सजा देती है तिनके तिनके को  तैयार होता है उसके सपनों का महल जो उसे सुरक्षितता का अहसास कराता है.  चिड़ा भी उसकी मदद् करवाता है,कभी वो ठहरती है नीड पर तो चिड़ा दाने लाता है,  दोनों अपनी मेहनत से सजा ही लेते हैं आशियाना अपना, कमाल के होते हैं ये पंछी भी...बिना कुछ सीखे सुंदर सा घरौंदा बना लेते हैं,  पर प्रकृति के आगे सब हतबल हैं जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है तो कयामत सभी पर आती है,  पंछी हो या इंसान,कुदरत सभी पर कहर बरपाती है.  चंद पलों के आये तूफान से जब चिड़िया का नीड़ धराशायी हो जाता है,तो चिड़े के साथ बैठकर कुछ पल का गम साँझा करती है,  देखकर अपने उजड़े आशियाने को,  ना चीत्कार करती है,ना किसी मदद की ...

ख़यालों के पतझड...

  बिखरे बिखरे से खयालात  अब सिमटने की जिद पकड़े बैठे हैं,  पर उलझने हैं हजारों जिनमे हम जकड़े बैठे हैं,  उलझनें जो झड़ जायेंगी दिल और दिमाग की शाखों से,  फ़िर चिंगरियाँ भी निकलेंगी ठंडी पड़ चुकी राखों से,  नई कोपलें फूटेंगी फ़िर हरे भरे विचारों की...  समेंट लेंगें उन्हें कागज पर हवा हो जाने के पहले बुझा देंगें कलम की आग धुआँ हो जाने के पहले Pallavi Laghate

"मानसिकता"

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                                                                 "मानसिकता" 
                                                              " प्रतिस्पर्धा का युग " आज के इस बदलते  दौर  ने  पालकों के बीच प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है,पालकों के बीच चल रही इस प्रतिस्पर्धा का शिकार  बेचारे मासूम बच्चे हो रहे है। ये स्पर्धा बच्चों को कक्षा में मिलने वाले  अंकों को लेकर हो रही है.एक तो पहले ही किताबों के बोझ ने बच्चों से उनका मासूम बचपन छीन लिया है,उसके ऊपर से अभिभावकों का दबाव की क्लास में अच्छे नंबर लाने हैं.जो उम्र बच्चों के खेलने कूदने की है वो पढाई के बोझ तले दब सी  गयी है। मै ऐसा नहीं कहती की बच्चों को नहीं पढ़ना चाहिए,पर पढाई के साथ उनका शारीरिक व्यायाम भी जरूरी है. मैंने अपने आजूबाजू नजर दौड़ाई तो देखा की पालकों ने नर्सरी और जूनियर सीनियर के बच्चों को भी ट्यूशन लगा रखा है,मै सोचने पर मजबूर हो गई की इतने छोटे क्लास के लिए ट्यूशन की क्या जरूरत,ये उम्र तो खेलते खेलत...