" प्रतिस्पर्धा का युग " आज के इस बदलते दौर ने पालकों के बीच प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है,पालकों के बीच चल रही इस प्रतिस्पर्धा का शिकार बेचारे मासूम बच्चे हो रहे है। ये स्पर्धा बच्चों को कक्षा में मिलने वाले अंकों को लेकर हो रही है.एक तो पहले ही किताबों के बोझ ने बच्चों से उनका मासूम बचपन छीन लिया है,उसके ऊपर से अभिभावकों का दबाव की क्लास में अच्छे नंबर लाने हैं.जो उम्र बच्चों के खेलने कूदने की है वो पढाई के बोझ तले दब सी गयी है। मै ऐसा नहीं कहती की बच्चों को नहीं पढ़ना चाहिए,पर पढाई के साथ उनका शारीरिक व्यायाम भी जरूरी है. मैंने अपने आजूबाजू नजर दौड़ाई तो देखा की पालकों ने नर्सरी और जूनियर सीनियर के बच्चों को भी ट्यूशन लगा रखा है,मै सोचने पर मजबूर हो गई की इतने छोटे क्लास के लिए ट्यूशन की क्या जरूरत,ये उम्र तो खेलते खेलत...